सबका मंगल सबका भला हो ! गुरु चाहना ऐसी है !!इसीलिए तो आए धरा पर सदगुरु आसारामजी है !!
स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।

Thursday, November 10, 2011

वे पाप जो प्रायश्चितरहित हैं


धर्मराज (मृत्यु के अधिष्ठाता देव) राजा भगीरथ से कहते हैं- "भूपाल ! जो स्नान अथवा पूजन के लिए जाते हुए लोगों के कार्य में विघ्न डालता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं। जो परायी निंदा और अपनी प्रशंसा में लगा रहता है तथा जो असत्य भाषण में रत रहता है, वह ब्रह्महत्यारा कहा गया है।
जो अधर्म का अनुमोदन करता है उसे ब्रह्मघात का पाप लगता है। जो दूसरों को उद्वेग में डालता है, चुगली करता है और दिखावे में तत्पर रहता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं।
भूपते ! जो पाप प्रायश्चितरहित हैं, उनका वर्णन सुनो। वे पाप समस्त पापों से बड़े तथा भारी नरक देने वाले हैं। ब्रह्महत्या आदि पापों के निवारण का उपाय तो किसी प्रकार हो सकता है परंतु जो ब्राह्मण अर्थात् जिसने ब्रह्म को जान लिया है ऐसे महापुरुष से द्वेष करता है, उसका पाप से कभी भी निस्तार नहीं होता।
नरेश्वर ! जो विश्वासघाती तथा कृतघ्न हैं उनका उद्धार कभी नहीं होता। जिनका चित्त वेदों की निंदा में ही रत है और जो भगत्कथावार्ता आदि की निंदा करते हैं, उनका इहलोक तथा परलोक में कहीं भी उद्धार नहीं होता।
भूपते ! जो महापुरुषों की निंदा को आदरपूर्वक सुनते हैं, ऐसे लोगों के कानों में तपाये हुए लोहे की बहुत सी कीलें ठोक दी जाती है। तत्पश्चात कानों के उन छिद्रों में अत्यंत गरम किया हुआ तेल भर दिया जाता है। फिर ये कुंभीपाक नरक में पड़ते हैं।
जो दूसरों के दोष बताते या चुगली करते हैं, उन्हें एक सहस्र युग तक तपाये हुए लोहे का पिण्ड भक्षण करना पड़ता है। अत्यंत भयानक सँडसो से उनकी जीभ को पीड़ा दी जाती है और वे अत्यंत घोर निरुच्छवास नामक नरक में आधे कल्प तक निवास करते हैं।
श्रद्धा का त्याग, धर्म कार्य का लोप, इन्द्रियसंयमी पुरुषों की और शास्त्र की निंदा करना महापातक बताया गया है।
जो परायी निंदा में तत्पर, कटुभाषी और दान में विघ्न डालने वाले होते हैं वे महापातकी बताये गये हैं। ऐसे महापातकी लोग प्रत्येक नरक में एक-एक युग रहते हैं और अंत में इस पृथ्वी पर आकर वे सात जन्मों तक गधा होते हैं। तदनंतर वे पापी दस जन्मों तक घाव से भरे शरीर वाले कुत्ते होते हैं, फिर सौ वर्षों तक उन्हें विष्ठा का कीड़ा होना पड़ता है। तदनंतर बारह जन्मों तक वे सर्प होते हैं। राजन ! इसके बाद एक हजार जन्मों तक वे मृग आदि पशु होते हैं। फिर सौ वर्षों तक स्थावर (वृक्ष) आदि योनियों में जन्म लेते हैं। तत्पश्चात् उन्हें गोधा (गोह) का शरीर प्राप्त होता है। फिर सात जन्मों तक वे पापाचारी चाण्डाल होते हैं। इसके बाद सोलह जन्मों तक उनकी दुर्गति होती है। फिर दो जन्मों तक वे दरिद्र, रोगपीड़ित तथा सदा प्रतिग्रह लेने वाले होते हैं। इससे उन्हें फिर नरकगामी होना पड़ता है।
राजन् ! जो झूठी गवाही देता है, उसके पाप का फल सुनो। वह जब तक चौदह इंद्रों का राज्य समाप्त होता है, तब तक सम्पूर्ण यातनाओं को भोगता रहता है। इस लोक में उसके पुत्र-पौत्र भी नष्ट हो जाते हैं और परलोक में वह रौरव तथा अन्य नरकों को क्रमश भोगता है।"
(नारद पुराणः पूर्व भाग-प्रथम पादः अध्याय 15)

Thursday, February 17, 2011

मनुष्य का वही जन्म, वही कर्म, वही आयु, वही मन और वही वाणी सफल है.....


(देवर्षि नारद का प्रचेताओं को उपदेश : श्रीमदभागवत, चतुर्थ स्कंध, अध्याय ३१ ) 
           इस लोक में मनुष्य का वही जन्म, वही कर्म, वही आयु, वही मन और वही वाणी सफल है, जिसके द्वारा सर्वात्मा सर्वेश्वर श्रीहरि का सेवन किया जाता है | जिनके द्वारा अपने स्वरुप का साक्षात्कार करानेवाले श्रीहरि को प्राप्त न किया जाय, उन माता-पिता की पवित्रता से, यज्ञोपवित-संस्कार से एवं यज्ञ-दीक्षा से प्राप्त होनेवाले उन तीन प्रकार के श्रेष्ठ जन्मों से, वेदोक्त कर्मों से, देवताओं के समान दीर्घ आयु से, शास्त्रज्ञान से, ताप से, वाणी की चतुराई से. अनेक प्रकार की बातें याद रखने की शक्ति से, सांख्य (आत्मानात्मविवेक) से, सन्यास और वेदाध्ययन से तथा व्रत-वैराग्य आदि अन्य कल्याण साधनों से भी पुरुष का क्या लाभ है?
                वास्तव में समस्त कल्याणों कि अवधि आत्मा ही है और आत्मज्ञान प्रदान करने वाले श्रीहरि ही सम्पूर्ण प्राणियों की प्रिय आत्मा है | जिस प्रकार वृक्ष की जड़ सिंचने से उसके तना, शाखा, उपशाखा आदि सभी का पोषण हो जाता है और जैसे भोजन द्वारा प्राणों को तृप्त करने से समस्त इन्द्रियाँ पुष्ट होती है, उसी प्रकार श्रीभगवान की पूजा ही सबकी पूजा है | जिस प्रकार वर्षाकाल में जल सूर्य के ताप से उत्पन्न होता है और ग्रीष्म ऋतु में उसी की किरणों में पुनः प्रवेश कर जाता है तथा जैसे समस्त चराचर भूत पृथ्वी से उत्पन्न होते है और फिर उसी में मिल जाते है, उसी प्रकार चेतना-चेतनात्मक यह समस्त प्रपंच श्रीहरि से ही उत्पन्न होता है और उन्ही में लीन हो जाता है | वस्तुतः यह विश्वात्मा श्रीभगवान का वह शास्त्र प्रसिद्द सर्वोपाधिरहित स्वरुप ही है | जैसे सूर्य की प्रभा उससे भिन्न नहीं होती, उसी प्रकार कभी-कभी गन्धर्व-नगर के समान स्फुरित होनेवाला यह जगत भगवान से भिन्न नहीं है;  तथा जैसे जाग्रत अवस्था में इन्द्रियाँ क्रियाशील रहती है किन्तु सुषुप्ति में उनकी शक्तियां लीन हो जाती है, उसी प्रकार यह जगत सर्गकाल में भगवान से प्रकट हो जाता है और कल्पांत होने पर उन्ही में लीन हो जाता है | स्वरूपतः तो भगवान में द्रव्य, क्रिया और ज्ञानरूपी त्रिविध अहंकार के कार्यों की तथा उनके निमित्त से ओने वाले भेदभ्रम की सत्ता है ही नहीं | जैसे बादल, अंधकार और प्रकाश- ये क्रमशः आकाश से प्रकट होते है और उसी में लीन हो जाते है; किन्तु आकाश इनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार ये सत्व, रज और तमोमयी शक्तियाँ कभी परब्रह्म से उत्पन्न होती है और कभी उसी में लीन हो जाती है | इसी प्रकार इनका प्रवाह चलता रहता है; किन्तु इससे आकाश के समान असंग परमात्मा में कोई विकार नहीं होता | अतः तुम ब्रह्मादि समस्त लोकपालों के भी अधीश्वर श्रीहरि को अपने से अभिन्न मानते हुए भजो; क्योंकि वे ही समस्त देहधारियों के एकमात्र आत्मा है | वे ही जगत के निमित्तकारण काल, उपादानकारण प्रधान और नियंता पुरुषोत्तम हैं तथा अपनी कालशक्ति से वे ही इस गुणों के प्रवाह रूप प्रपंच का संहार कर देते है |
             वे भक्तवत्सल भगवान समस्त जीवों पर दया करने से, जो कुछ मिल जाय उसी में संतुष्ट रहने से तथा समस्त इन्द्रियों को विषयों से निवृत्त करके शांत करने से शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते है | पुत्रेषणा  आदि सब प्रकार की वासनाओं के निकल जाने से जिनका अंतःकरण शुद्ध हो गया है, उन संतों के ह्रदय में उनके निरंतर बढते हुए चिंतन से खिंचकर अविनाशी श्रीहरि आ जाते है और अपनी भक्ताधीनता को चरितार्थ करते हुए हृदयाकाश की भांति वहां से हटते नहीं | भगवान तो अपने को (भगवान को) ही सर्वस्व मानने वाले निर्धन पुरुषों पर ही प्रेम करते है; क्योंकि वे परम रसज्ञ है – उन अकिंचनों की अनन्याश्रया अहैतु की भक्ति में कितना माधुर्य होता है, इसे प्रभु अच्छी तरह जानते है | जो लोग अपने शास्त्रज्ञान, धन, कुल और कर्मों के मद से उन्मत्त होकर, ऐसे निष्किंचन साधुजनों का तिरस्कार करते है, उन दुर्बुद्धियों की पूजा तो प्रभु स्वीकार ही नहीं कर करते | भगवान स्वरूपानंद से ही परिपूर्ण है, उन्हें निरंतर अपनी सेवा में रहने वाली लक्ष्मीजी तथा उनकी इच्छा करने वाले नरपति और देवताओं की भी कोई परवाह नहीं है | इतने पर भी वे अपने भक्तों के तो अधीन ही रहते है | अहो ! ऐसे करुणा-सागर श्रीहरि को कोई भी कृतज्ञ पुरुष थोड़ी देर के लिए भी कैसे छोड़ सकता है ? 

Wednesday, January 12, 2011

भगवान कपिल -देवहुति संवाद : भक्ति का स्वरूप क्या है ?

देवहुति बोली : भूमन् ! प्रभो ! इन दुष्ट इन्द्रियों की विषय लालसा से मैं बहुत ऊब गयी हूँ और इनकी इच्छा पूरी करते रहने से ही घोर अज्ञानान्धकार में पड़ी हुई हूँ । अब आपकी कृपा से मेरी जन्म परंपरा समाप्त हो चुकी है, इसी से इस दुस्तर अज्ञानान्धकार से पार लगाने के लिए सुंदर नेत्ररूप आप प्राप्त हुए हैं । आप संपूर्ण जीवों के स्वामी भगवान आदिपुरुष हैं तथा अज्ञानान्धकार से अंधे पुरुषों के लिए नेत्रस्वरूप सूर्य की भाँति उदित हुए हैं । देव ! इन देह-गेह आदि में जो मैं-मेरेपन का दुराग्रह होता है, वह भी आपका ही कराया हुआ है, अतः अब आप मेरे इस महामोह को दूर कीजिये । आप अपने भक्तों के संसाररूप वृक्ष के लिए कुठार के समान है, मैं प्रकृति और पुरुष का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से आप शरणागतवत्सल की शरण में आई हूँ । आप भागवतधर्म जाननेवालों में सबसे श्रेष्ठ हैं, मैं आपको प्रणाम करती हूँ ।

भगवान कपिल ने कहा - माता ! यह मेरा निश्चय है की अध्यात्मयोग ही मनुष्यों के आत्यंतिक कल्याण का मुख्य साधन है, जहाँ दुःख और सुख की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है । साध्वि ! सब अंगों से सम्पन्न उस योग का मैंने पहले नारदादि ऋषियों के सामने, उनकी सुनने की इच्छा होने पर, वर्णन किया था । वही अब मैं आपको सुनाता हूँ ।

                  इस जीव के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही माना गया है । विषयों में आसक्त होने पर वह बंधन का हेतु होता है और परमात्मा मे अनुरक्त होने पर वही मोक्ष का कारण बन जाता है । जिस समय यह मन मैं और मेरेपन के कारण होने वाले काम-लोभ आदि विकारों से मुक्त एवं शुद्ध हो जाता है, उस समय वह सुख-दुःख से छूटकर सम अवस्था में आ जाता है । तब जीव अपने ज्ञान-वैराग्य और भक्ति से युक्त हृदय से आत्मा को प्रकृति से परे, एकमात्र (अद्वितीय), भेदरहित, स्वयंप्रकाश, सूक्ष्म, अखंड और उदासीन (सुख-दुःखशून्य) देखता है तथा प्रकृति को शक्तिहीन अनुभव करता है । योगियों के लिए भगवतप्राप्ति के निमित्त सर्वात्मा श्रीहरि के प्रति की हुई भक्ति के समान और कोई मंगलमय मार्ग नहीं है । विवेकीजन संग या आसक्ति को ही आत्मा का अच्छेद्य बंधन मानते है, किन्तु वही संग या आसक्ति जब संतों-महापुरुषों के प्रति हो जाती है, तो मोक्ष का खुला द्वार बन जाती है ।

                    जो लोग सहनशील, दयालु, समस्त देहधारियों के अकारण हितू, किसी के प्रति भी शत्रुभाव न रखनेवाले, शान्त, सरलस्वभाव और सत्पुरुषों का सम्मान करनेवाले होते हैं, जो मुझमें अनन्यभाव से सुदृढ़ प्रेम करते हैं, मेरे लिए सम्पूर्ण कर्म तथा अपने सगे-संबंधियों को भी त्याग देते हैं और मेरे परायण रहकर मेरी पवित्र कथाओं का श्रवण, कीर्तन करते हैं तथा मुझमें ही चित्त लगाए रहते है- उन भक्तों को संसार के तरह-तरह के ताप कोई कष्ट नहीं पहुंचाते हैं । साध्वि ! ऐसे-ऐसे सर्वसंगपरित्यागी महापुरुष ही साधू होते हैं, तुम्हें उन्ही के संग की इच्छा करनी चाहिए, क्योंकि वे आसक्ति से उत्पन्न सभी दोषों को हर लेनेवाले हैं । सत्पुरुषों के समागम से मेरे पराक्रमों का यथार्थ ज्ञान करानेवाली तथा हृदय और कानों को प्रिय लगनेवाली कथाएँ होती हैं । उनका सेवन करने से शीघ्र ही मोक्षमार्ग में श्रद्धा, प्रेम और भक्ति का क्रमशः विकास होगा । फिर मेरी सृष्टि आदि लीलाओं का चिंतन करने से प्राप्त हुई भक्ति के द्वारा लौकिक एवं पारलौकिक सुखों में वैराग्य हो जाने पर मनुष्य सावधानतापूर्वक योग के भक्तिप्रधान सरल उपायों से समाहित होकर मनोनिग्रह के लिए यत्न करेगा । इस प्रकार प्रकृति के गुणों से उत्पन्न हुए शब्दादि विषयों का त्याग करने से, वैराग्ययुक्त ज्ञान से, योगसे और मेरे प्रति की हुई सुदृढ़ भक्ति से मनुष्य मुझ अपने अंतरात्मा को इस देह में ही प्राप्त कर लेता है ।

                देवहुति ने कहा - भगवन ! आपकी समुचित भक्ति का स्वरूप क्या है? और मेरी-जैसी अबलाओं के लिए कैसी भक्ति ठीक है, जिससे कि मैं सहज में ही आपके निर्वाण पद को प्राप्त कर सकूँ ? निर्वाणस्वरूप प्रभो ! जिसके द्वारा तत्वज्ञान होता है और जो लक्ष्य को बेधनेवाले बाण के समान भगवान की प्राप्ति करानेवाला है, वह आपका कहा हुआ योग कैसा है और उसके कितने अंग हैं ? हरे ! यह सब आप मुझे इस प्रकार समझाइए जिससे कि आपकी कृपा से मैं मंदमति स्त्रीजाति भी इस दुर्बोध विषय को सुगमता से समझ सकूँ ।

                     श्रीभगवान ने कहा - माता ! जिसका चित्त एकमात्र भगवान में ही लग गया है, ऐसे मनुष्य की वेदविहित कर्मों मे लगी हुई तथा विषयों का ज्ञान करानेवाली (कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रिय-दोनों प्रकार की) इन्द्रियों की जो सत्वमूर्ति श्रीहरि के प्रति स्वाभाविकी प्रवृत्ति है, वही भगवान की अहैतुकी भक्ति है । यह मुक्ति से भी बढ़कर है, क्योंकि जठरानल जिस प्रकार खाये हुए अन्न को पचाता है, उसी प्रकार यह भी कर्मसंस्कारों के भंडाररूप लिंगशरीर को तत्काल भस्म कर देती है । मेरी चरणसेवा में प्रीति रखनेवाले और मेरी ही प्रसन्नता के लिए समस्त कार्य करनेवाले कितने ही बड़भागी भक्त, जो एक दूसरे से मिलकर प्रेमपूर्वक मेरे ही पराक्रमों की चर्चा किया करते है, मेरे साथ एकीभाव (सायुज्यमोक्ष) की भी इच्छा नहीं करते । माँ ! वे साधुजन अरुण-नयन एवं मनोहर मुखारविंद से युक्त मेरे परम सुंदर और वरदायक दिव्य रूपों की झांकी करते है और उनके साथ सप्रेम संभाषण भी करते है, जिसके लिए बड़े-बड़ेतपस्वी भी लालायित रहते है । दर्शनीय अंग-प्रत्यंग, उदार हर-विलास, मनोहर चितवन और सुमधुर वाणी से युक्त मेरे उन रूपों की माधुरी में उनका मन और इंद्रियाँ फँस जाती है । ऐसी मेरी भक्ति न चाहने पर भी उन्हे परमपद की प्राप्ति करा देती है । अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर यद्यपि वे मुझ मायापति के सत्यादि लोकों की भोगसंपत्ति, भक्ति की प्रवृत्ति के पश्चात स्वयं प्राप्त होने वाली अष्टसिद्धि अथवा बैकुंठलोक के भगवदीय ऐश्वर्य की भी इच्छा नहीं करते, तथापि मेरे धाम में पहुँचने पर उन्हे ये सब विभूतियाँ स्वयं ही प्राप्त हो जाती है । जिनका एकमात्र मैं ही प्रिय, आत्मा, पुत्र, मित्र, गुरु, सुहृद और इष्टदेव हूँ - वे मेरे ही आश्रय में रहने वाले भक्तजन शांतिमय बैकुंठधाम में पहुँचकर किसी प्रकार भी इन दिव्य भोगों से रहित नहीं होते और न उन्हे मेरा कालचक्र ही ग्रस सकता है ।
माताजी ! जो लोग इहलोक, परलोक और इन दोनों लोकों में साथ जानेवाले वासनामय लिंगदेह को तथा शरीर से संबंध रखनेवले जो धन, पशु एवं गृह आदि पदार्थ है, उन सबको और अनयनी संग्रहों को भी छोडकर अनन्य भक्ति से सब प्रकार मेरा ही भजन करते हैं - उन्हे मैं मृत्युरूप संसारसागर से पार कर देता हूँ । मैं साक्षात भगवान हूँ, प्रकृति और पुरुष का भी प्रभु हूँ तथा समस्त प्राणियों का आत्मा हूँ, मेरे सिवा और किसी का आश्रय लेने से मृत्युरूप महाभय से छुटकारा नहीं मिल सकता । मेरे भय से यह वायु चलती है, मेर भय से सूर्य तपता है, मेरे भय से इंद्र वर्षा करता और अग्नि जलाती है तथा मेरे ही भय से मृत्यु अपने कार्य में प्रवृत्त होता हिय । योगीजन ज्ञान वैराग्य युक्त भक्तियोग के द्वारा शांति प्राप्त करने के लिए मेरे निर्भय चरणकमलों का आश्रय लेते है । संसार में मनुष्य के लिए सबसे बड़ी कल्याणप्राप्ति यही है कि उसका चित्त तीव्र भक्तियोग के द्वारा मुझमे लगकर स्थिर हो जाय । 

Tuesday, November 30, 2010

भगवान सूर्य किस देवता का ध्यान एवं पूजन करते हैं?

ब्रह्माजी बोले - याज्ञवल्क्य! एक बार मैंने भगवान सूर्यनारायण की स्तुति की । उस स्तुति से प्रसन्न होकर वे प्रत्यक्ष प्रकट हुए, तब मैंने उनसे पूछा कि महाराज ! वेद-वेदांगों में और पुराणों में आपका ही प्रतिपादन हुआ है। आप शाश्वत अज, तथा परब्रह्म स्वरूप है । यह जगत आप में ही स्थित है। गृहस्थाश्रम जिनका मूल है, ऐसे वे चारों आश्रमों वाले रात-दिन आपकी अनेक मूर्तियों का पूजन करते है। आप ही सबके माता-पिता और पूज्य है। आप किस देवता का ध्यान एवं पूजन करते है? मैं इसे समझ नहीं पा रहा हूँ, इसे मैं सुनना चाहता हूँ, मेरे मन में बड़ा कौतूहल है ।

भगवान सूर्य ने कहा - ब्राह्मन ! यह अत्यंत गुप्त बात है, किन्तु आप मेरे परम भक्त है, इसलिए मैं इसका यथावत वर्णन कर रहा हूँ- वे परमात्मा सभी प्राणियों में व्याप्त, अचल, नित्य, सूक्ष्म तथा इंद्रियातीत है, उन्हे क्षेत्रज्ञ, पुरुष, हिरण्यगर्भ, महान, प्रधान तथा बुद्धि आदि अनेक नामों से अभिहित किया जाता है। जो तीनों लोकों के एकमात्र आधार है, वे निर्गुण होकर भी अपनी इच्छा से सगुण हो जाते है, सबके साक्षी है, स्वत: कोई कर्म नहीं करते और न तो कर्मफल की प्राप्ति से संलिप्त रहते है। वे परमात्मा सब ओर सिर, नेत्र, हाथ, पैर, नासिका, कान तथा मुख वाले है, वे समस्त जगत को आच्छादित करके अवस्थित है तथा सभी प्राणियों में स्वच्छंद होकर आनंदपूर्वक विचरण करते है।

शुभाशुभ कर्म रूप बीजवाला शरीर क्षेत्र कहलाता है। इसे जानने के कारण परमात्मा क्षेत्रज्ञ कहलाते है। वे अव्यक्तपुर में शयन करने से पुरुष, बहुत रूप धारण करने से विश्वरूप और धारण-पोषण करने के कारण महापुरुष कहे जाते है। ये ही अनेक रूप धारण करते है। जिस प्रकार एक ही वायु शरीर में प्राण-अपान आदि अनेक रूप धारण किए हुए है और जैसे एक ही अग्नि अनेक स्थान-भेदों के कारण अनेक नामों से अभिहित की जाती है, उसी प्रकार परमात्मा भी अनेक भेदों के कारण बहुत रूप धारण करते है। जिस प्रकार एक दीप से हजारों दीप प्रज्वलित हो जाते है, उसी प्रकार एक परमात्मा से संपूर्ण जगत उत्पन्न होता है। जब वह अपनी इच्छा से संसार का संहार करता है, तब फिर एकाकी ही रह जाता है। परमात्मा को छोडकर जगत में कोई स्थावर या जंगम पदार्थ नित्या नहीं है, क्योंकि वे अक्षय, अप्रमेय और सर्वज्ञ कहे जाते है। उनसे बढ़कर कोई अन्य नहीं है, वे ही पिता है, वे ही प्रजापति है, सभी देवता और असुर आदि उन परमात्मा भास्करदेव की आराधना करते है और वे उन्हे सद्गति प्रदान करते है। ये सर्वगत होते हुए भी निर्गुण है। उसी आत्मस्वरूप परमेश्वर का मैं ध्यान करता हूँ तथा सूर्यरूप अपने आत्मा का ही पूजन करता हूँ। हे याज्ञवल्क्य मुने ! भगवान सूर्य ने स्वयं ही ये बातें मुझसे कही थी । (भविष्य पुराण - ब्राह्मपर्व , अध्याय 66-67)

Sunday, November 21, 2010

गुरु पूरे पाये, जग का दुख सुख क्यों सहना !

अजपा गायत्री

ऐसा सुमिरन कीजिये, सहा रहै लौ लाय ।
बिनु जिभ्या बिन तालुवै, अन्तर सुरत लगाय ॥1

हंसा सोहम तार कर, सुरति मकरिया पोय ।
उतार उतार फिरि फिरि चढ़ै, सहजों सुमिरन होय ॥2

बरत बांध कर धरन में, कला गगन में खाय ।
अर्ध उर्ध नट ज्यौं फिरै, सहजों राम रिझाय ॥3

लगे सुन्न में टकटकी, आसान पदम लगाय ।
नाभि नासिका माहिं करि, सहजों रहै समाय ॥4

सहज स्वांस तीरथ बहै, सहजो जो कोई न्हाय ।
पाप पुन्न दोनों छुटै, हरि पद पहुँचै जाय ॥5

हक्कारे उठि नाम सूँ, सक्कारे होय लीन ।
सहजों अजपा जाप यह, चरनदास कहि दीन ॥6

सब घट अजपा जाप है, हंसा सोहम पुर्ष ।
सुरत हिये ठहराय के, सहजों या विधि निर्ख ॥7

सब घट व्यापक राम है, देही नाना भेष ।
राव रंक चांडाल घर, सहजों दीपक एक ॥8॥ 
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गुरु पूरे पाये ....

नमो नमो गुरु तुम सरना ।
तुम्हारे ध्यान भरम भय भागै, जीते पांचौ और मना ॥1

दुख दारिद्र मिटै तुम नाउँ, कर्म कटै जो होहिं घना ।
लोक परलोक सकाल बिधि सुधरै, पग लागै आय ज्ञान गुना ॥ 2

चरण छूए सब गति मति पलटे, पारस जैसे लोह सुना ।
सीप परसि स्वाति भयो मोती, सोहट है सिर राज रना ॥ 3

ब्रह्म होय जीव बुधि नासै, जब कैसे होना मरना ।
अमर होय अमरापद पावै, यह गुर कहिए गुरु बचना ॥4

चरणदास गुरु पूरे पाये, जग का दुख सुख क्यों सहना ।
सहजों बाई ब्याध छुटाकर, आनंद मंगल में रहना ॥5

Saturday, November 13, 2010

श्री गीतगोविंद - दशावतार स्तुति

हे जगदीश ! मत्स्यावतार लेकर वेदों का उद्धार करने वाले,
कूर्मावतार से जगत को धारण करने वाले,
वराह अवतार से पृथ्वी मण्डल को धारण करने वाले,
नृसिंहरूप धारण कर हिरण्यकस्यपु का वाढ करने वाले,
वामनावतार से बाली को छलने वाले,
परशुराम रूप से क्षत्रियों का नाश करने वाले,
रामावतार लेकर रावण का विनाश करने वाले,
बलरामावतार में हल धारण करने वाले,
बुद्धावतार में दया का विस्तार करने वाले,
कल्की अवतार धारण कर म्लेच्छ का संहार करने वाले
(इस प्रकार दश विधि अवतारधारी)
श्रीकृष्णचंद्र को प्रणाम है।
हे सूर्यमण्डल के आभूषण !
(अर्थात सूर्य में जो तेज है वह आपही का है)
हे सांसारिक दुःख का विनाश करने वाले
(अर्थात संसार का आवागमन मिटानेवाले),
हे मुनिजनों के मानस (चित्त) के हंस स्वरूप !
हे देव!, कालिय नाम सर्पराज के मद को नष्ट करनेवाले!
भक्तजनों के आनंददाता !
हे यदुकुलरूपी कमल के सूर्य !
हे मधु और मुरनरक नामक असुरों के विनाशक!
हे गरुड़वाहन!
हे देवताओं की क्रीडा आदि के कारण!
हे निर्मल कमल के पत्र के समान विशाल नेत्रोंवाले!
हे संसार रूपी जाल से छुड़ानेवाले !
हे त्रिलोकी रूप गृह के निधान स्वरूप !
हे जानकीजी से आभूषित !
हे दूषण नाम राक्षसराज के संहारक!
हे रण में रावण को शांत करने वाले,
नवीन मेघ के सदृश सुंदर !
हे मंदराचल को धारण करनेवाले !
हे लक्ष्मी के मुखरूपी चंद्रमा के चकोर !
हे देव ! हम लोग आपके चरणों में प्रणाम करते हैं ।
यह आप जानिए और प्रणत हम लोगों का कल्याण करें !
आपकी जय हो ! हे देव ! हे हरे ! आपकी जय हो !
श्री जयदेव कवि का बनाया हुआ, मंगलकारी मनोहर गीत श्रवण या पढ़नेवालों को आनंद दाता है । (श्री गीतगोविंद द्वितीय प्रबंध)

Wednesday, November 3, 2010

विषयों को हमने नहीं भोगा !!!

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता स्तपो न तप्तं वयमेव तप्ता: । 
कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णावयमेव जीर्णा: ॥ 
विषयों को हमने नहीं भोगा किन्तु विषयों ने हमारा भोग कर दिया, हमने तप को नहीं तपा किन्तु तप ने हमें तपा डाला। काल का खात्मा न हुआ किन्तु हमारा ही खात्मा हो चला। तृष्णा का बुढ़ापा न आया पर हमारा ही बुढ़ापा आ गया।। 12॥


क्षान्तं न क्षमया गृहोचितसुखं त्यक्तं न संतोषत: ।
सोढा दु:सहशांतवाततपनक्लेशा न तप्तं तपः ॥
ध्यातं वित्तमहर्निशं नियमितप्रार्णेर्न शम्भो: पदं । 
तत्ततकर्मकृतं यदेव मुनिभिस्तैस्तै: फलैर्वंचितम ॥
क्षमा तो हमने की किन्तु धर्म के ख्याल से नहीं की। हमने घर के सुख चैन तो छोड़े परंतु संतोष से नहीं छोड़े। हमने सर्दी, गर्मी और हवा के न सह सकने योग्य दुख तो सहे किन्तु हमने ये सब दुख ताप की गरज से नहीं, दरिद्रता के कारण सहे। हम दिन रात धन के ध्यान में लगे रहे किन्तु प्राणायाम क्रिया द्वारा शम्भु के चरणों का ध्यान नहीं किया। हमने काम तो सब मुनियों जैसे किए परंतु उनकी तरह फल हमें नहीं मिले॥ 13॥ 


बलिभिर्मुखमाक्रांतं पलितैरंकितं शिर: । 
गात्राणि शिथिलायंते तृष्णैका तरुणायते ॥ 
चेहरे पर झुर्रियाँ पढ गई, सिर के बाल पक कर सफ़ेद हो गए, सारे अंग ढीले हो गए पर तृष्णा तो तरुण होती जाती है।। 14॥


येनैवाम्बरखंडेन संवीतो निशि चंद्रमा। 
तेनैव च दिवा भानुरहो दौर्गत्यमेतयो:॥

आकाश के जिस टुकड़े को ओढ़ कर चंद्रमा रात बिताता है उसी को ओढ़कर सूर्य दिन बिताता है। इन दोनों की कैसी दुर्गति होती है।। 15॥


अवश्यं यातारश्चिरतरमूषित्वाSपि विषया 
वियोगे को भेदस्त्यजति न जानो यत्स्वयममून्। 
व्रजन्त: स्वातंत्र्यादतुतलपरितापाय मनस: 
स्वयं तयक्त्वा ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति ॥  
विषयों को हम चाहे जीतने दिनों तक क्यों न भोगें, एक दिन वे निश्चय ही अलग हो जायेंगे। तब मनुष्य उन्हे स्वयं, अपनी इच्छा से ही क्यों न छोड़ दे ? इस जुदाई में क्या फर्क है? अगर यह न छोड़ेगा तो वे छोड़ देंगे। जब वे स्वयं मनुष्य को छोड़ेंगे तब उसे बड़ा दुख और मन-क्लेश होगा । अगर मनुष्य उन्हे स्वयं छोड़ देगा तो उसे अनंत सुख और शांति प्राप्त होगी।।16॥ 


विवेकव्याकोशे विदधति शमं शाम्यति तृषा । 
परिश्वंगे तुंगे प्रसरतितरां सा परिणति: ।। 
जब ज्ञान का उदय होता है तब शांति की प्राप्ति होती है । शांति की प्राप्ति से तृष्णा शांत हो जाती है किन्तु वही तृष्णा विषयों के संसर्ग से, बेहद बढ़ती है अर्थात विषयों से तृष्णा कभी शांत नहीं हो सकती ॥17॥