सबका मंगल सबका भला हो ! गुरु चाहना ऐसी है !!इसीलिए तो आए धरा पर सदगुरु आसारामजी है !!
स्नातं तेन सर्व तीर्थम् दातं तेन सर्व दानम् कृतो तेन सर्व यज्ञो.....उसने सर्व तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने सर्व दान दे दिये, उसने सब यज्ञ कर लिये जिसने एक क्षण भी अपने मन को आत्म-विचार में, ब्रह्मविचार में स्थिर किया।

Friday, October 22, 2010

गुर्वष्टकम्

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं,
यशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम्
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ १॥


1. यदि शरीर रूपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तरित हो, मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ?


1. One’s body may be handsome, wife beautiful, fame, excellent and varied, and wealth like unto Mount Meru; but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence?
कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वं,
गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ २॥


2. सुन्दरी पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र, घर एवं स्वजन आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हो किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इस प्रारब्ध-सुख से क्या लाभ?


2. Wife, wealth, sons, grandsons, etc., all these; home, relations- the host of all these there may be; but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 
षड़ंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या,
कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ३॥



3. वेद एवं षटवेदांगादि शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, जिनमें सुन्दर काव्य निर्माण की प्रतिभा हो, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ?

3. The Vedas with their six auxiliaries and knowledge of sciences may be on one’s lips; one may have the gift of poesy; and may compose good prose and poetry; but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence?




विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः,
सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ४॥

4. जिन्हें विदेशों में समादर मिलता हो, अपने देश में जिनका नित्य जय-जयकार से स्वागत किया जाता हो और जो सदाचार पालन में भी अनन्य स्थान रखता हो, यदि उनका भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो सदगुणों से क्या लाभ?


4. In other lands I am honored; in my country I am fortunate; in the ways of good conduct there is none that excels me-thus one may think, but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 

क्षमामण्डले भूपभूपलबृब्दैः,
सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ५॥

5. जिन महानुभाव के चरणकमल पृथ्वीमण्डल के राजा-महाराजाओं से नित्य पूजित रहा करते हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इस सदभाग्य से क्या लाभ?


5. One’s feet may be adored constantly by hosts of emperors and kings of the world; but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 

यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्,
जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात्
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ६॥

6. दानवृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति दिगदिगांतरों में व्याप्त हो, अति उदार गुरु की सहज कृपादृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख-एश्वर्य हस्तगत हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों में आसक्तभाव न रखता हो तो इन सारे एशवर्यों से क्या लाभ?


6. My fame has spread in all quarters by virtue of generosity and prowess; all the things of the world are in my hands as a reward of these virtues; but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 



न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ,
न कन्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम्
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ७॥

7. जिनका मन भोग, योग, अश्व, राज्य, स्त्री-सुख और धनोभोग से कभी विचलित न हुआ हो, फिर भी गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाया हो तो मन की इस अटलता से क्या लाभ?



7. Not in enjoyment, not in concentration, not in the multitudes of horses; nor in the face of the beloved, nor in wealth does the mind dwell; but if that mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 



अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये,
न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्ध्ये
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ ८॥

8. जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में, अपने कार्य या शरीर में तथा अमूल्य भण्डार में आसक्त न हो, पर गुरु के श्रीचरणों में भी वह मन आसक्त न हो पाये तो इन सारी अनासक्त्तियों का क्या लाभ?



8. Not in the forest, nor even in one’s own house, nor in what-is-to-be-accomplished, nor in the body, nor in what is invaluable does my mind dwell; but if my mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 



गुरोरष्टकं यः पठेत्पुरायदेही,
यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही
लमेद्वाच्छिताथं पदं ब्रह्मसंज्ञं,
गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम् ॥ ९॥

9. जो यति, राजा, ब्रह्मचारी एवं गृहस्थ इस गुरु अष्टक का पठन-पाठन करता है और जिसका मन गुरु के वचन में आसक्त है, वह पुण्यशाली शरीरधारी अपने इच्छितार्थ एवं ब्रह्मपद इन दोनों को संप्राप्त कर लेता है यह निश्चित है 



9. That virtuous person who reads this octad on the Guru, and whose mind is fixed on the sayings of the Guru- whether he be an ascetic, king, student, or householder, attains the desired goal, the state which is called Brahman 

-By Adya Guru Shankaracharya
श्रीमद आद्य शंकराचार्यविरचितम्
 
 
 
 
 
 

नौ प्रकार का अमृत

स्कन्द पुराण में आया है कि गृहस्थ के घर नौ प्रकार का अमृत सदैव रहना चाहिए, इससे वह सुखी रहता है। ये सभी बिना पैसे के अमृत हैं।

एक तो आपके घर कोई भी आ जाय तो उससे मीठे वचन बोलें।
दूसरा-सौम्य दृष्टि से उसको निहारें। चाहे वह कितना भी बदमाश हो, क्रूर हो, कैसा भी हो परंतु आपक द्वार आया है, इस समय वह अतिथिदेव है। अतिथि में देवत्व देखोगे तो आपका देवत्व जाग्रत होगा।
तीसरा-सौम्य मुख रखें। उसके साथ सौम्य-सुखद व्यवहार करें।
चौथा-तब आप सौम्य मन बना लीजिये।
पाँचवाँ- आप खड़े होकर उसके प्रति आदर का भाव व्यक्त करें। भले वह आपको गाली देता है, आपका कट्टर दुश्मन हैं किंतु आपने उसको मान दे दिया, खड़े होकर सम्मान दे दिया तो आधा तो आपने उसको जीत ही लिया और यदि आपने उसको आपने चुभने वाली बात कह के या अपमानित कर के रवाना कर दिया तो आपने अपने लिए अपमान का द्वार चौड़ा कर दिया।
छठा – स्वागत के दो मीठे वचन बोलिये और जल पान से उसका स्वागत कीजिये।
सातवाँ – स्नेहपूर्वक वार्तालाप करें। जैसे – प्रेम से उसको पूछें कि 'कैसे आये ? आज तो बहुत कृपा हुई....' आदि-आदि।
आठवाँ – आप उसके पास थोड़ी देर बैठें।
नौवाँ – उसको विदा करने के लिए उसके साथ चार कदम चल पड़ें।

भले वह आदमी आपसे छोटा हो या बड़ा हो किंतु आपने इन नौ अमृतों का उपयोग किया तो आपका दिल बड़ा बनेगा और उसके दिल में आपका बड़प्पन बैठ जायेगा।

आपने अपना फर्नीचर दिखाकर या धन दौलत और हेकड़ी से उसको प्रभावित किया तो थोड़ी देर के लिए वह भले भौतिक वस्तुओं से प्रभावित हो जाय लेकिन आपका मित्र बनकर नहीं जायेगा, आपके लिए उसके दिल में कुछ के कुछ विचार उठेंगे। आप अपना ऐश्वर्य दिखाकर किसी को प्रभावित करने की गलती न करो। आप अपनी बात कहकर, उस पर प्रभाव जमा के उसको प्रभावित करो – यह बहुत छोटी बात है।

लोग मिलने आते हैं तो अपनी सुनाने लग जाते हो किंतु लोग आपकी बात सुनने नहीं आते। आपका दुःख सुनने नहीं आते। आपका दुःख सुनने नहीं आते। वे अपना दुःख और अपनी बात सुनाने आते हैं। आपका अहंकार अपने पर थोपने नहीं आते अपितु अपनी इच्छा और अपनी आकांक्षाओं को तृप्त करने के लिए आपसे मिलते हैं। तो आप लोगों की तृप्ति के कारण बनिये। ऐसा नहीं कि लोगों के आगे आप अपनी हेकड़ी के कारण जाने जायें। मान योग्य कर्म करो पर हृदय में मान की इच्छा न रखो, आप अमानी रहो।

'महाभारत' में आता हैः 'जो अमानी रहता है अर्थात् मान योग्य कर्म तो करता है पर मान की चाह नहीं रखता, वह सबका सम्माननीय हो जाता है।'

स्रोतः लोक कल्याण सेतु

आत्‍मज्ञान क्या है ?

श्री परमात्मने नम:
अष्टावक्र गीता
पहला प्रकरण

मूलम्
जनक उवाच
कथं ज्ञानमवाप्नो ति कथं मुक्तिर्भविष्योति ।
वैराग्यंन च कथं प्राप्त्मेतद्ब्रूहि मम प्रभो ।।1।।
अर्थ – हे स्वामि‍न ! कैसे पुरूष ज्ञान को प्राप्त होता है और मुक्ति कैसे होवेगी और वैराग्ये कैसे प्राप्त होवेगा ? इसको मेरे प्रति कहिये ।।

व्याख्या

राजा जनक अष्टावक्रजी से प्रथम 3 प्रश्न पूछते है-

1. हे प्रभो ! पुरुष आत्मज्ञान को कैसे प्राप्त होता है?

2. संसार बंधन से कैसे मुक्त होता है अर्थात जन्म-मरणरूपी संसार से कैसे छूटता है?

3. एवं वैराग्य को कैसे प्राप्त होता है?

राजा का तात्पर्य यह था कि :

ऋषि वैराग्य के स्वरूप को, उसके कारण को और उसके फल को;

ज्ञान के स्वरूप को, उसके कारण को और उसके फल को;

मुक्ति के स्वरूप को, उसके कारण को और उसके भेद को मेरे प्रति विस्तार से कहें ॥१॥

राजा के प्रश्नों को सुनकर अष्टावक्रजी ने अपने मन में विचार किया कि संसार में चार प्रकार के पुरुष हैं –

एक ज्ञानी, दूसरा मुमुक्षु, तीसरा अज्ञानी और चौथा मूढ़ ।
चारों में से राजा तो ज्ञानी नहीं है क्योंकि जो संशय और विपर्यय से रहित होता है और आत्मानंद करके आनंदित होता है वही ज्ञानी होता है परंतु राजा ऐसा नहीं है, किन्तु यह संशय से युक्त है ।
एवं अज्ञानी भी नहीं है क्योंकि जो विपर्यय ज्ञान और असंभावना आदि को करके युक्त होता है उसका नाम अज्ञानी है परंतु राजा ऐसा भी नहीं है । तथा जिसके चित्त में स्वर्गादिक फलों कि कामनाएँ भरी हों उसका नाम अज्ञानी है परंतु राजा ऐसा भी नहीं है ।
 
यदि ऐसा होता तो यज्ञादिक कर्मों के विषय में विचार करता, सो तो इसने नहीं किया है एवं मूढ़बुद्धि वाला भी नहीं है क्योंकि जो मूढ़बुद्धि वाला होता है वह कभी भी महात्मा को दंडवत प्रणाम नहीं करता है किन्तु वह अपनी जाति और धनादिकों के अभिमान में ही मरा जाता है, सो ऐसा भी राजा नहीं क्योंकि हमको महात्मा जानकर हमारा सत्कार कर अपने भवन में लाकर संसार बंधन से छूटने कि इच्छा करके जिज्ञासुओं कि तरह राजा ने प्रश्नों को किया है । इसी से सिद्ध होता है कि राजा जिज्ञासु अर्थात मुमुक्षु है और आत्मविद्या का पूर्ण अधिकारी है, और साधनों के बिना आत्मविद्या कि प्राप्ति नहीं होती, इस वास्ते अष्टावक्रजी प्रथम राजा के प्रति साधनों को कहते हैं ॥१॥

मूलम्
अष्टावक्र उवाच ।

मुक्तिमिच्छसि चेत्ता्त विषयान् विषवत्यज ।
क्षमार्ज्ज्वद यातोषसत्यं पीयूषवद़मज ।।2।।
 
अष्टावक्रजी जनकजी के प्रति कहते है कि हे तात! यदि तुम संसार से मुक्त होने कि इच्छा करते हो तो चक्षु, रसना आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियों के जो शब्द, स्पर्श आदि पाँच विषय है उनको तू विष कि तरह त्याग दे क्योंकि जैसे विष के खाने से पुरुष मर जाता है वैसे ही इन विषयों के भोगने से भी पुरुष संसार चक्र रूपी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इसलिए मुमुक्षु को प्रथम इनका त्याग करना आवश्यक है और इन विषयों के अत्यंत भोगने से रोग आदि उत्पन्न होते है और बुद्धि भी मलिन होती है एवं सार-असार वस्तु का विवेक नहीं रहता है इसलिए ज्ञान के अधिकारी को अर्थात मुमुक्षु को इनका त्याग करना ही मुख्य कर्तव्य है ।

प्रश्न – हे भगवन् ! विषय भोग के त्यागने से शरीर नहीं रह सकता है और जीतने बड़े-बड़े ऋषि, राजर्षि हुए है उन्होने भी इनका त्याग नहीं किया है और वे आत्मज्ञान को प्राप्त हुए है और भोग भी भोगते रहे है फिर आप हमसे कैसे कहते है कि इनको त्यागो ।

उत्तर - अष्टावक्रजी कहते है कि हे राजन् ! आपका कहना सत्य है एवं स्वरूप से विषय भी नहीं त्यागे जाते है परंतु इनमें जो अति आसक्ति है अर्थात पांचों विषयों में से किसी एक के अप्राप्त होने से चित्त कि व्याकुलता होना और सदैव उसी में मन का लगा रहना आसक्ति है। उसके त्याग का नाम ही विषयों का त्याग है एवं जो प्रारब्धभोग से प्राप्त हो उसी में संतुष्ट होना, लोलुप न होना और उनकी प्राप्ति के लिए सत्य-असत्य भाषण आदि का न करना किन्तु प्राप्तिकाल में उनमें दोष दृष्टि और ग्लानि होनी और उसके त्याग कि इच्छा होनी और उनकी प्राप्ति के लिए किसी के आगे दीन न होना, इसी का नाम वैराग्य है । यह जनक जी के एक प्रश्न का उत्तर हुआ ।

प्रश्न – हे भगवन् ! संसार में नंगे रहने को, भिक्षा मांगकर खानेवाले को लोग वैराग्यवान् कहते है और उसमें जड़भरत आदिकों के दृष्टांत देते हैं , आपके कथन से लोगों का कथन विरुद्ध पड़ता है ।

उत्तर – संसार में जो मूढ्बुद्धिवाले हैं वे ही नंगे रहनेवालों और मांगकर खानेवालों को वैराग्यवान जानते है और नंगों से कान फूकवाकर उनके पशु बनते है परंतु युक्ति और प्रमाण से यह वार्ता विरुद्ध है ।

यदि नंगे रहने से ही वैराग्यवान होता हो तो सब पशु और पागल आदिकों को भी वैराग्यवान् कहना चाहिए पर ऐसा तो वे नहीं देखते हैं और यदि मांगकर खाने से ही वैराग्यवान हो जावे तो सब दीन दरिद्रियों को भी वैराग्यवान कहना चाहिए पर ऐसा तो नहीं कहते है। इन्ही युक्तियों से सिद्ध होता है कि नंगा रहने और मांगकर खानेवाले का नाम वैराग्यवान् नहीं ।

यदि कहो कि विचारपूर्वक नंगे रहनेवाले का नाम वैराग्यवान है तो यह भी वार्ता शास्त्रविरुद्ध है क्योंकि विचार के साथ इस वार्ता का विरोध आता है। जहां पर प्रकाश रहता है वहाँ पर तम नहीं रहता । ये दोनों जैसे परस्पर विरोधी है वैसे ही सत्वगुण का कार्य-सत्य और मिथ्या का विवेचनरूपी विचार है और तमोगुण का कार्य नंगा रहना है । देखिये- वर्ष के बारहों महीनों में नंगे रहनेवालों के शरीर को कष्ट होता है । सर्दी के मौसम में सर्दी के मारे उनके होश बिगड़ते है और उनके हृदय में विचार उत्पन्न भी नहीं हो सकता है एवं गर्मी और बरसात में मच्छर काट-काट खाते है । अतः सदैव उनकी वृत्ति दुःखाकार बनी रहती है, विचार का गंधमात्र भी नहीं रहता है तथा श्रुति से भी विरोध आता है-

आत्मानं चेद्विजानियाद्यस्मीति पुरुष: ।

किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरम नुसञ्ज्वरेत ॥ १॥

यदि विद्वान ने आत्मा को जान लिया कि यह आत्मा, ब्रह्म मैं ही हूँ तब किसकी इच्छा करता हुआ और किस कामना के लिए शरीर को तपावेगा किन्तु कदापि नहीं तपावेगा और ‘गीता’ में भी भगवान ने इसको तामसी ताप लिखा है । इसी से साबित होता है कि नंगे रहनेवाले का नाम वैराग्यवान् नहीं है और नंगे रहने का नाम वैराग्य नहीं है किन्तु केवल मूर्खों को पशु बनाने के वास्ते नंगा रहना है एवं सकामी इस तरह के व्यवहार को करता है, निष्कामी नहीं करता है तथा जड़ भरतादिकों को अपने पूर्वजन्म का वृतांत याद था ।

एक मृगी के बच्चे के साथ स्नेह करने से उनको मृग के तीन जन्म लेने पड़े थे, इसी वास्ते वे संगदोष से डरते हुए असंग होकर रहते थे ।

पंचदशी में लिखा है-

नह्याहारादि संत्यज्य भारतादि: स्थित: क्वचित् ।

काष्ठपाषाणवत् किन्तु सङ्ग्भीत्या उदास्यते ॥२॥
 
जड़भरतादिक खान-पहरान आदिकों को त्याग करके कहीं भी नहीं रहे है किन्तु पत्थर और लकड़ी कि तरह जड़ होकर संग से डरते हुए उदासीन हो करके रहे है। जब तक देह के साथ आत्मा का तादात्म्य-अध्यास बना है तब तक तो नंगा रहना दुःख का और मूर्खता का ही कारण है। जब अध्यास नहीं रहेगा तब इसको नंगे रहने से दुःख भी नहीं होगा। आत्मा के साक्षात्कार होने से, जब मन उस महान ब्रह्मानन्द में डूब जाता है तब शरीरादिकों के साथ अध्यास नहीं रहता है और न विशेष करके संसार के पदार्थों का उस पुरुष को ज्ञान रहता है। मदिरा करके उन्मत्त को जैसे शरीर की और वस्त्रादिकों की खबर नहीं रहती है वैसे ही जीवन्मुक्त ज्ञानी कि वृत्ति केवल आत्माकार रहती है। उसको भी शरीरादिकों कि खबर नहीं रहती है, ऐसी अवस्था जीवन्मुक्त कि लिखी हुई है। मुमुक्षु वैराग्यवान कि नहीं लिखी क्योंकि उसको संसार के पदार्थों का ज्ञान ज्यों का त्यों बना रहता है। संसार के पदार्थों में दोष-दृष्टि और ग्लानि का नाम ही वैराग्य है और खोटे पुरुषों के संग से डरकर महात्माओं का संग करने वाला क्षमा, कोमलता, दया और सत्यभाषणादिक गुणों को अमृतवत पान करने अर्थात धारण करने वाले का नाम वैराग्यवान है और वही ज्ञान का अधिकारी है ॥२॥

अष्टावक्रजी जनकजी के प्रति वैराग्यी के स्वकरूप को कहकर राजा के द्वितीय प्रश्न के उत्तर को कहते है-
मूलम्

न पृथिवी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान् ।
एषां साक्षिणमात्मा्नं चिद्रूप विद्धि मुक्तये ।। 3।।
 
अर्थ - तू न पृथ्वि है न जल है न अग्नि है न वायु है न आकाश है पर मुक्ति के लिये इन सबका साक्षी चैतन्यहरूप अपने को जान ।।
व्याख्या

दूसरा प्रश्न‍ राजा का यह था कि पुरूष आत्म ज्ञान को कैसे प्राप्त होता है अर्थात ज्ञान का स्वरूप क्या है ?

इसके उत्तर में ऋषिजी कहते है कि अनादि काल से देहादिकों के साथ जो आत्मा का तादात्म्य अध्यास हो रहा है उस अध्यास से ही पुरूष देह को आत्मा मानता है और इसी से जन्म मरण रूपी संसार चक्र में पुन: पुन: भ्रमण करता रहता है । उस अध्यास का कारण अज्ञान है । उस अज्ञान की निवृत्ति आत्मज्ञान से होती है और अज्ञान की निवृत्ति से अध्या:स की निवृत्ति भी होती है । इसी वास्ते ऋषिजी प्रथम कार्य के सहित कारण की निवृत्ति का हेतु जो आत्म ज्ञान है, उसी को कहते है- हे राजन् ! तुम पृथ्वि नही हो और न तुम जलरूप हो, न अग्निरूप हो, न वायु रूप हो और न आकाशरूप हो । अर्थात इन पॉंचो तत्वों में से कोई भी तत्व तुम्हारा स्वंरूप नहीं है और पॉंचो तत्वों का समुदायरूप इंद्रियों का विषय जो यह स्थूल शरीर है वह भी तुम नहीं हो क्योंकि शरीर क्षण क्षण में परिणाम को प्राप्त होता जाता है । जो बाल अवस्था का शरीर होता है वह कुमार अवस्था में नहीं रहता है । कुमार अवस्था वाला शरीर युवावस्था में नहीं रहता । युवावस्था वाला शरीर वृद्धावस्थां में नहीं रहता और आत्मा सब अवस्थाओं में एक ही ज्यों का त्यों रहता है । इसी वास्ते युवा और वृद्धावस्था में प्रत्यभिज्ञाज्ञान भी होता है अर्थात पुरूष कहता है कि मैनें बाल्यावस्था में माता और पिता का अनुभव किया । कुमारावस्था में खेलता रहा, युवावस्थां में स्त्री के साथ शयन किया । अब देखिये – अवस्थाऍं सब बदली जाती है पर अवस्था का अनुभव करने वाला आत्मा् नहीं बदलता है किंतु एकरस ज्यों का त्यों ही रहता है । यदि अवस्था के साथ आत्मा भी बदलता जाता तब प्रत्यभिज्ञाज्ञान कदापि नहीं होता क्योंकि ऐसा नियम है कि जो अनुभव का कर्ता होता है वही स्मृति और प्रत्य‍भिज्ञा का भी कर्ता होता है । दूसरे के देखे हुए पदार्थों का स्मरण दूसरे को नहीं होता है । इसी से सिद्ध होता है कि आत्मा् देहादिकों से भिन्न् है और देहादिकों का साक्षी भी है । हे राजन! उसी चिद्रूप को तुम अपना आत्मा् जानो ।

जैसे घरवाला पुरूष कहता है – मेरा घर है, पलंग है और मेरा बिछौना है और वह पुरूष घर और पलंग आदि से जैसे जुदा है वैसे पुरूष कहता है – यह मेरा शरीर है, ये मेरे इंद्रियादिक है । जो शरीर और इंद्रियों का अनुभव करने वाला आत्मा है वह शरीर, इंद्रियादिकों से भिन्न है और उनका साक्षी है । श्रुति कहती है - अयमात्मा ब्रह़म् । जो यह प्रत्यक्ष तुम्हारा आत्मा है यही ब्रहम् है, यही ईश्वर है ।

अष्टावक्रजी कहते है कि हे जनक ! पृथ्वि आदिक पॉंच भूत और उनका कार्य स्थूल शरीर तथा इंद्रिय और उनके विषय शब्दादिक, इन सबसे तू न्या‍रा है और सबाक तू साक्षी है, ऐसे निश्चयका नाम ही आत्मज्ञान है ।।3।।

आत्म‍ज्ञान के स्वरूप को अष्टावक्रजी जनकजी के प्रति कहकर अब मुक्ति के स्वरूप तथा उपाय को कहते है ।

श्री नाम वंदना

चौपाई :
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥1॥

मैं श्री रघुनाथजी के नाम 'राम' की वंदना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात्‌ 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है। वह 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों का प्राण है, निर्गुण, उपमारहित और गुणों का भंडार है॥1॥

*महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥2॥

जो महामंत्र है, जिसे महेश्वर श्री शिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशी में मुक्ति का कारण है तथा जिसकी महिमा को गणेशजी जानते हैं, जो इस 'राम' नाम के प्रभाव से ही सबसे पहले पूजे जाते हैं॥2॥

जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी॥3॥

आदिकवि श्री वाल्मीकिजी रामनाम के प्रताप को जानते हैं, जो उल्टा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गए। श्री शिवजी के इस वचन को सुनकर कि एक राम-नाम सहस्र नाम के समान है, पार्वतीजी सदा अपने पति (श्री शिवजी) के साथ राम-नाम का जप करती रहती हैं॥3॥

हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को॥
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥4॥

नाम के प्रति पार्वतीजी के हृदय की ऐसी प्रीति देखकर श्री शिवजी हर्षित हो गए और उन्होंने स्त्रियों में भूषण रूप (पतिव्रताओं में शिरोमणि) पार्वतीजी को अपना भूषण बना लिया। (अर्थात्‌ उन्हें अपने अंग में धारण करके अर्धांगिनी बना लिया)। नाम के प्रभाव को श्री शिवजी भलीभाँति जानते हैं, जिस (प्रभाव) के कारण कालकूट जहर ने उनको अमृत का फल दिया॥4॥

दोहा :
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥19॥

श्री रघुनाथजी की भक्ति वर्षा ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और 'राम' नाम के दो सुंदर अक्षर सावन-भादो के महीने हैं॥19॥

चौपाई :
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥
ससुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥1॥

दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमाला रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिए सुलभ और सुख देने वाले हैं और जो इस लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह करते हैं (अर्थात्‌ भगवान के दिव्य धाम में दिव्य देह से सदा भगवत्सेवा में नियुक्त रखते हैं।)॥1॥

कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥
बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥2॥

ये कहने, सुनने और स्मरण करने में बहुत ही अच्छे (सुंदर और मधुर) हैं, तुलसीदास को तो श्री राम-लक्ष्मण के समान प्यारे हैं। इनका ('र' और 'म' का) अलग-अलग वर्णन करने में प्रीति बिलगाती है (अर्थात बीज मंत्र की दृष्टि से इनके उच्चारण, अर्थ और फल में भिन्नता दिख पड़ती है), परन्तु हैं ये जीव और ब्रह्म के समान स्वभाव से ही साथ रहने वाले (सदा एक रूप और एक रस),॥2॥

नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥
भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥3॥

ये दोनों अक्षर नर-नारायण के समान सुंदर भाई हैं, ये जगत का पालन और विशेष रूप से भक्तों की रक्षा करने वाले हैं। ये भक्ति रूपिणी सुंदर स्त्री के कानों के सुंदर आभूषण (कर्णफूल) हैं और जगत के हित के लिए निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं॥3॥

स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के॥
जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥4॥

ये सुंदर गति (मोक्ष) रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं, कच्छप और शेषजी के समान पृथ्वी के धारण करने वाले हैं, भक्तों के मन रूपी सुंदर कमल में विहार करने वाले भौंरे के समान हैं और जीभ रूपी यशोदाजी के लिए श्री कृष्ण और बलरामजी के समान (आनंद देने वाले) हैं॥4॥

दोहा :
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ॥20॥

तुलसीदासजी कहते हैं- श्री रघुनाथजी के नाम के दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं, जिनमें से एक (रकार) छत्ररूप (रेफ र्) से और दूसरा (मकार) मुकुटमणि (अनुस्वार) रूप से सब अक्षरों के ऊपर है॥20॥

चौपाई :
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥1॥

समझने में नाम और नामी दोनों एक से हैं, किन्तु दोनों में परस्पर स्वामी और सेवक के समान प्रीति है (अर्थात्‌ नाम और नामी में पूर्ण एकता होने पर भी जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं। प्रभु श्री रामजी अपने 'राम' नाम का ही अनुगमन करते हैं (नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं)। नाम और रूप दोनों ईश्वर की उपाधि हैं, ये (भगवान के नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि हैं और सुंदर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धि से ही इनका (दिव्य अविनाशी) स्वरूप जानने में आता है॥1॥

को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥2॥

इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणों का तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नाम के अधीन देखे जाते हैं, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता॥2॥

रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें॥
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें॥3॥

कोई सा विशेष रूप बिना उसका नाम जाने हथेली पर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जा सकता और रूप के बिना देखे भी नाम का स्मरण किया जाए तो विशेष प्रेम के साथ वह रूप हृदय में आ जाता है॥3॥

नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥4॥

नाम और रूप की गति की कहानी (विशेषता की कथा) अकथनीय है। वह समझने में सुखदायक है, परन्तु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। निर्गुण और सगुण के बीच में नाम सुंदर साक्षी है और दोनों का यथार्थ ज्ञान कराने वाला चतुर दुभाषिया है॥4॥

दोहा :
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥21॥

तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है, तो मुख रूपी द्वार की जीभ रूपी देहली पर रामनाम रूपी मणि-दीपक को रख॥21॥

चौपाई :
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥
ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥1॥

ब्रह्मा के बनाए हुए इस प्रपंच (दृश्य जगत) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान्‌ मुक्त योगी पुरुष इस नाम को ही जीभ से जपते हुए (तत्व ज्ञान रूपी दिन में) जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं॥1॥

जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥
साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥2॥

जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को (यथार्थ महिमा को) जानना चाहते हैं, वे (जिज्ञासु) भी नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं। (लौकिक सिद्धियों के चाहने वाले अर्थार्थी) साधक लौ लगाकर नाम का जप करते हैं और अणिमादि (आठों) सिद्धियों को पाकर सिद्ध हो जाते हैं॥2॥

जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥
राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥3॥

(संकट से घबड़ाए हुए) आर्त भक्त नाम जप करते हैं, तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जगत में चार प्रकार के (1- अर्थार्थी-धनादि की चाह से भजने वाले, 2-आर्त संकट की निवृत्ति के लिए भजने वाले, 3-जिज्ञासु-भगवान को जानने की इच्छा से भजने वाले, 4-ज्ञानी-भगवान को तत्व से जानकर स्वाभाविक ही प्रेम से भजने वाले) रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं॥3॥

चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥4॥

चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है, इनमें ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय हैं। यों तो चारों युगों में और चारों ही वेदों में नाम का प्रभाव है, परन्तु कलियुग में विशेष रूप से है। इसमें तो (नाम को छोड़कर) दूसरा कोई उपाय ही नहीं है॥4॥

दोहा :
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्हहुँ किए मन मीन॥22॥

जो सब प्रकार की (भोग और मोक्ष की भी) कामनाओं से रहित और श्री रामभक्ति के रस में लीन हैं, उन्होंने भी नाम के सुंदर प्रेम रूपी अमृत के सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है (अर्थात्‌ वे नाम रूपी सुधा का निरंतर आस्वादन करते रहते हैं, क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते)॥22॥

चौपाई :
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग ‍िनज बस निज बूतें॥1॥

निर्गुण और सगुण ब्रह्म के दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी सम्मति में नाम इन दोनों से बड़ा है, जिसने अपने बल से दोनों को अपने वश में कर रखा है॥1॥

प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥
एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥2॥
उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥
ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनँद रासी॥3॥

सज्जनगण इस बात को मुझ दास की ढिठाई या केवल काव्योक्ति न समझें। मैं अपने मन के विश्वास, प्रेम और रुचि की बात कहता हूँ। (‍िनर्गुण और सगुण) दोनों प्रकार के ब्रह्म का ज्ञान अग्नि के समान है। निर्गुण उस अप्रकट अग्नि के समान है, जो काठ के अंदर है, परन्तु दिखती नहीं और सगुण उस प्रकट अग्नि के समान है, जो प्रत्यक्ष दिखती है।

(तत्त्वतः दोनों एक ही हैं, केवल प्रकट-अप्रकट के भेद से भिन्न मालूम होती हैं। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण तत्त्वतः एक ही हैं। इतना होने पर भी) दोनों ही जानने में बड़े कठिन हैं, परन्तु नाम से दोनों सुगम हो जाते हैं। इसी से मैंने नाम को (निर्गुण) ब्रह्म से और (सगुण) राम से बड़ा कहा है, ब्रह्म व्यापक है, एक है, अविनाशी है, सत्ता, चैतन्य और आनन्द की घन राशि है॥2-3॥

अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥
नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥4॥

ऐसे विकाररहित प्रभु के हृदय में रहते भी जगत के सब जीव दीन और दुःखी हैं। नाम का निरूपण करके (नाम के यथार्थ स्वरूप, महिमा, रहस्य और प्रभाव को जानकर) नाम का जतन करने से (श्रद्धापूर्वक नाम जप रूपी साधन करने से) वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है, जैसे रत्न के जानने से उसका मूल्य॥4॥

दोहा :
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।
कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥23॥

इस प्रकार निर्गुण से नाम का प्रभाव अत्यंत बड़ा है। अब अपने विचार के अनुसार कहता हूँ, कि नाम (सगुण) राम से भी बड़ा है॥23॥

गुरु वंदना

गुरु वंदना
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥
मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूँजो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं॥
चौपाई :
बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥
मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूँजो सुरुचि (सुंदर स्वाद)सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुंदर चूर्ण हैजो सम्पूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है॥
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥
वह रज सुकृति (पुण्यवान्‌ पुरुष) रूपी शिवजी के शरीर पर सुशोभित निर्मल विभूति है और सुंदर कल्याण और आनन्द की जननी हैभक्त के मन रूपी सुंदर दर्पण के मैल को दूर करने वाली और तिलक करने से गुणों के समूह को वश में करने वाली है॥
श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
श्री गुरु महाराज के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान हैजिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने वाला हैवह जिसके हृदय में आ जाता हैउसके बड़े भाग्य हैं॥
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥
उसके हृदय में आते ही हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसार रूपी रात्रि के दोष-दुःख मिट जाते हैं 

चौपाई :
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥
श्री गुरु महाराज के चरणों की रज कोमल और सुंदर नयनामृत अंजन हैजो नेत्रों के दोषों का नाश करने वाला है।

साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥
संतों का चरित्र कपास के चरित्र (जीवन) के समान शुभ हैजिसका फल नीरसविशद और गुणमय होता है। (कपास की डोडी नीरस होती हैसंत चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं हैइससे वह भी नीरस हैकपास उज्ज्वल होता हैसंत का हृदय भी अज्ञान और पाप रूपी अन्धकार से रहित होता हैइसलिए वह विशद है और कपास में गुण (तंतु) होते हैंइसी प्रकार संत का चरित्र भी सद्गुणों का भंडार होता हैइसलिए वह गुणमय है।) (जैसे कपास का धागा सुई के किए हुए छेद को अपना तन देकर ढँक देता हैअथवा कपास जैसे लोढ़े जानेकाते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढँकता हैउसी प्रकार) संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्रों (दोषों) को ढँकता हैजिसके कारण उसने जगत में वंदनीय यश प्राप्त किया है॥